उर्वशी (एक नया ढंग)

 देवराज कहते हैं उर्वशी से –

हे, उर्वशी

तू अम्बर की लाल परी 

ओ धरती की धूल ।

तू तारो की अमर संगिनी 

ओ पतझड़ का फूल ।

ओ संसारी रंगरूप धरे

 तू कवि कल्पना से भी परे।

वहां माया की अनबुझी प्यास

यहां देवदूत हैं तेरे दास।

पल भर में तू सारी गरिमा सारा गौरव भूल गई।

त्याग के अपनी मर्यादा उसकी बाहों में झूल गई ।।

उर्वशी कहती है –

नयनों में उसके नयन छोड़ आयी

न पूछो कहां मैं ये मन छोड़ आयी।

एक अनजानी सी लहर उठी नदिया के निर्मल तीरे से,

मैं चली तो ये न जान सकी कोई साथ हो लिया धीरे से।

लहरों के संग संग खेलूं मैं

किरणों में आंखें खोलूँ मैं,

मैं झांकू बादल–बादल से 

पत्ते पत्ते से बोलूं मैं,

यदि फेर के आंखे चल देती

मुझ पर ये रंग कहां चढ़ता।

जो चाहें पूछे देवराज

प्रश्नों से प्रेम नहीं डरता।।


उर्वशी ब्रम्हा जी से सवाल कर देती है कि–

सदियों पहले तुमने ही, धरती गगन के धागे जोड़े।

यहां टूट के गिरते हैं तारे, जब कोई फूल वहां तोड़े।।

बादल का सागर पर झरना, क्या ये तुम्हारा खेल नहीं ।

फिर क्यों कहते हो धरती का, अम्बर से कोई मेल नहीं।।

हे देवराज, यह प्रश्न आज मेरे तन मन को झकझोरे है,

क्या पावन प्रेम कथाओं से इतिहास के पन्ने कोरे हैं।

क्या सुनके शंकर का डमरू

गौरी ने आंखे फेरी थीं।

क्या राधा के पग रुक पाए,

जब श्याम ने ताने छेड़ी थीं।

जब वही लाग मेरे मन में लगी

मेरा मान गया, मेरा मोल गया।

मैं प्रेम सिंहासन पर बैठी तो

राजसिंहासन डोल गया।।

















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